Saturday, November 21, 2009

खता या सजा ...........?

"उनको चाहा था बस इतनी सी खता थी अपनी
 वो जुदा हमसे हों एक ये भी सजा थी अपनी
 मेरे होंठों पे तबस्सुम जिन्हें मंज़ूर न था
 उनके पहलू में क़ज़ा आये दुआ थी अपनी "

6 comments:

  1. bahut khoob ... kya likha hai ...
    अगर जीभर के देखूँ तो, वो कहते क्या जमाना है ,
    कोई बहसी कोई रमता, कोई कहता दीवाना है |
    मैं उनको प्यार से देखूँ, तो बोलो क्या बुरा करता ,
    कि वो तो गैर के संग है, मुझे इतना बताना है |

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  2. khadija ji,
    behatreen ashaar hai !
    blog-jagat me swagat hai aapka !
    anand v. joha

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  3. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

    कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
    वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
    डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
    इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
    और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

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  4. Bauht umda shair hai.. par

    Kaza ki aarzu, gair rasmi tohmat hai yeh
    khud se khud ki nagawar ek sazish hai yeh...
    koi soo tujhe chhoo bhee na kasegi raazish

    itna eaitbaar to mujhe mere khuda par hai.

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  5. not " kasegi" its sakegi.. pls correct

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